भारत में महंगी चिकित्सा मशीनों पर विदेशी निर्भरता कम करने की कोशिश अब एक ऐसे क्षेत्र तक पहुंच गई है, जहां तकनीक विकसित करना आसान नहीं माना जाता। बेंगलुरु की मेडिकल-टेक कंपनी Voxelgrids ने देश में विकसित 1.5 टेस्ला की MRI मशीन तैयार की है, जिसका उद्देश्य केवल MRI को भारत में बनाना नहीं, बल्कि इसे कम लागत, कम वजन और कम ऊर्जा खपत वाली तकनीक के रूप में विकसित करना है। इस मशीन के पीछे कई वर्षों का अनुसंधान, स्वदेशी सॉफ्टवेयर और इलेक्ट्रॉनिक्स का विकास तथा एक ऐसी चुंबकीय तकनीक शामिल है जिसे कंपनी तरल हीलियम पर निर्भरता से अलग बताती है।
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि MRI जैसी जटिल चिकित्सा तकनीक में केवल मशीन का बाहरी ढांचा तैयार करना पर्याप्त नहीं होता। शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र, उसे नियंत्रित रखने वाली व्यवस्था, बेहद कम तापमान पर काम करने वाली तकनीक, सिग्नल को पकड़ने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स और उन संकेतों को शरीर की स्पष्ट तस्वीर में बदलने वाला सॉफ्टवेयर—इन सभी को एक साथ काम करना पड़ता है।
भारत सरकार ने भी 2023 में Voxelgrids द्वारा विकसित 1.5 टेस्ला की हल्की व तेज स्वदेशी MRI मशीन लॉन्च की जानकारी दी थी। अब सामने आई नई जानकारियां इस तकनीक के डिजाइन, लागत, पोर्टेबिलिटी और इसके पीछे मिले समर्थन को लेकर तस्वीर को और स्पष्ट करती हैं।
भारत को अपनी MRI मशीन की जरूरत क्यों पड़ी?

MRI जांच शरीर के अंदर मौजूद ऊतकों और अंगों की विस्तृत तस्वीरें तैयार करने के लिए इस्तेमाल होती है। इसमें एक्स-रे जैसी आयनकारी विकिरण का उपयोग नहीं होता, लेकिन MRI मशीन को खरीदना, स्थापित करना और चलाना काफी महंगा हो सकता है। यही वजह है कि भारत में MRI की उपलब्धता बड़े शहरों और बेहतर सुविधाओं वाले अस्पतालों तक ज्यादा केंद्रित रही है। Tata Trusts के अनुसार मौजूदा MRI मशीनें भारी और महंगी होने के साथ-साथ विशेष विद्युत और स्थापना संबंधी जरूरतें भी रखती हैं।
Voxelgrids के संस्थापक अर्जुन अरुणाचलम के मुताबिक भारत हर साल लगभग ₹3,500 करोड़ के MRI से संबंधित उत्पादों का आयातकरता है और कई जगह MRI जांच की कीमत करीब ₹10,000 तक पहुंच सकती है। उनके अनुसार भारत में CT मशीनों की संख्या MRI मशीनों से लगभग तीन गुना है, जिसका एक कारण MRI सिस्टम की खरीद और रखरखाव की अधिक लागत है।
ऐसे में स्वदेशी MRI का उद्देश्य केवल आयात का विकल्प तैयार करना नहीं है। असली लक्ष्य ऐसी मशीन बनाना है जिसे कम लागत पर तैयार किया जा सके, जिसकी स्थापना अपेक्षाकृत आसान हो और जिसे उन जगहों तक भी ले जाया जा सके जहां पारंपरिक भारी MRI मशीन लगाना मुश्किल है।
MRI मशीन बनाना इतना कठिन क्यों है?
MRI मशीन को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि इसके अंदर केवल एक बड़ा चुंबक नहीं होता। इसकी सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र, क्रायोजेनिक यानी अत्यंत कम तापमान पर काम करने वाली व्यवस्था, रेडियो-फ्रीक्वेंसी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स तथा इमेजिंग सॉफ्टवेयर शामिल हैं।
1.5 टेस्ला की MRI मशीन में बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र तैयार किया जाता है। शरीर के भीतर मौजूद परमाणुओं से मिलने वाले संकेतों को मशीन के सेंसर पकड़ते हैं और फिर कंप्यूटर प्रणाली उन संकेतों को ऐसी तस्वीर में बदलती है जिससे डॉक्टर शरीर के अंदर की संरचनाओं को देख और उनका आकलन कर सकें।
इस पूरी प्रक्रिया में छोटी-सी तकनीकी समस्या भी मशीन की तस्वीर की गुणवत्ता, स्थिरता या सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए MRI को बड़े पैमाने पर विकसित करने के लिए केवल इलेक्ट्रॉनिक्स का ज्ञान पर्याप्त नहीं है; चुंबक, कम तापमान वाली तकनीक, विद्युत प्रणाली, सिग्नल प्रोसेसिंग और चिकित्सा इमेजिंग—इन सभी क्षेत्रों में विशेषज्ञता चाहिए।
Voxelgrids ने इसी वजह से किसी मौजूदा विदेशी मशीन की सीधी नकल करने के बजाय अपना सिस्टम शुरू से विकसित किया। कंपनी के अनुसार उसकी टीम ने सॉफ्टवेयर और इलेक्ट्रॉनिक्स को भी अंदर से विकसित किया है। 2026 की रिपोर्टों के अनुसार शुरुआती चार इंजीनियरों की टीम बढ़कर करीब 33 लोगों तक पहुंच चुकी है।
Voxelgrids की MRI में क्या अलग है? हीलियम, वजन और लागत का पूरा मामला
इस भारतीय MRI की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसका चुंबकीय सिस्टम है। पारंपरिक सुपरकंडक्टिंग MRI मशीनों में चुंबक को बहुत कम तापमान पर बनाए रखने के लिए तरल हीलियम का इस्तेमाल किया जाता है। हीलियम दुर्लभ और महंगी गैस है और इसे संभालना तथा लगातार उपलब्ध रखना मशीन के संचालन की लागत और व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
Voxelgrids ने ऐसी सुपरकंडक्टिंग चुंबकीय तकनीक विकसित की है जिसे कंपनी तरल हीलियम के बिना चलने वाली व्यवस्था के रूप में बताती है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार मशीन में जरूरत पड़ने पर नाइट्रोजन आधारित व्यवस्था का विकल्प भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मशीन की बनावट और संचालन से जुड़े खर्च को कम करने की कोशिश की गई है।
मशीन के डिजाइन में इलेक्ट्रॉनिक्स को भी ज्यादा सघन तरीके से व्यवस्थित किया गया है। कंपनी के अनुसार पारंपरिक MRI सिस्टम की तुलना में इसके अंदर केबलों की संख्या लगभग एक-तिहाई तक रखी गई है, जिससे बिजली की खपत और मशीन के आकार को कम करने में मदद मिलती है।
वजन में अंतर भी काफी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार Voxelgrids की पूरी बॉडी 1.5 टेस्ला MRI का वजन लगभग 2.3 टन है, जबकि सामान्य MRI सिस्टम करीब 4 से 6 टन तक भारी हो सकते हैं। कंपनी इसे स्थायी अस्पताल में लगाने के साथ-साथ मोबाइल यूनिट के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में भी तैयार कर रही है।
यही हल्का डिजाइन इस तकनीक का सबसे व्यावहारिक फायदा बन सकता है। यदि मशीन को ट्रक या दूसरे मोबाइल प्लेटफॉर्म पर ले जाना संभव होता है, तो MRI जैसी जांच को केवल बड़े शहरों के अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों, कस्बों और दूरदराज के इलाकों में भी पहुंचाना आसान हो सकता है।
क्या भारतीय MRI से जांच की कीमत 50 से 70 प्रतिशत तक घट सकती है?
यह दावा समझने में थोड़ा अंतर रखना जरूरी है। मशीन की निर्माण लागत कम होना और मरीज की MRI जांच की कीमत कम होना एक ही बात नहीं है। अस्पताल की लागत में मशीन के अलावा स्टाफ, बिजली, रखरखाव, सेवा, परिसर और दूसरी व्यवस्थाएं भी शामिल होती हैं।
फिर भी Voxelgrids का डिजाइन इन लागतों को कम करने की दिशा में बनाया गया है। कंपनी के संस्थापक के अनुसार स्वदेशी तकनीक के कारण मशीन की लागत विदेशी मशीनों की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत कम हो सकती है और MRI जांच की कीमत में लगभग 70 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना है। Tata Trusts ने भी बताया था कि इस तकनीक का उद्देश्य MRI की लागत को लगभग तीन गुना तक कम करना और इसे ज्यादा लोगों के लिए सुलभ बनाना है।
यहां 70 प्रतिशत सस्ती MRI को मौजूदा हर अस्पताल की निश्चित कीमत नहीं समझना चाहिए। यह कंपनी की लागत और संभावित भविष्य की कीमतों से जुड़ा अनुमान है। बड़े पैमाने पर उत्पादन और अलग-अलग अस्पतालों में वास्तविक इस्तेमाल के बाद ही यह पता चलेगा कि मरीजों को इसका कितना सीधा लाभ मिलता है।
फिर भी अगर मशीन की खरीद और संचालन लागत में पर्याप्त कमी आती है, तो इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। MRI जैसी महंगी जांच को कम लागत में उपलब्ध कराने का मतलब है कि ऐसे मरीज भी बेहतर जांच करा सकते हैं जिनके लिए मौजूदा कीमत बड़ी आर्थिक बाधा बन जाती है।
रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू का इस MRI मशीन से क्या संबंध है?
इस स्वदेशी MRI की कहानी सिर्फ इंजीनियरिंग की नहीं है। इतने जटिल मेडिकल उपकरण को वर्षों तक विकसित करने के लिए लगातार आर्थिक समर्थन की भी जरूरत थी। अर्जुन अरुणाचलम ने 2016 में Tata Trusts से संपर्क किया था। इसके बाद Voxelgrids को Tata Trusts के Foundation for Innovation and Social Entrepreneurship यानी FISE से समर्थन मिला। Tata Trusts के अनुसार इसी सहयोग ने कंपनी को शुरुआती विकास चरण में आगे बढ़ने में मदद की।
बाद में कंपनी की मशीन का प्रोटोटाइप बेंगलुरु के Sathya Sai Institute of Higher Medical Sciences में स्थापित किया गया और 2018 में उससे पहली तस्वीरें प्राप्त हुईं। इसके बाद Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बू और Zoho Corporation का समर्थन भी महत्वपूर्ण रहा। 2021 में Zoho के नेतृत्व में Voxelgrids ने लगभग 5 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई। यह समर्थन उस समय आया जब कंपनी को लंबे और महंगे विकास चक्र के बीच अपने काम को जारी रखने के लिए पूंजी की जरूरत थी।
कंपनी के संस्थापक के अनुसार एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी की ओर से अधिग्रहण का प्रस्ताव भी आया था, लेकिन Voxelgrids ने स्वतंत्र रूप से अपनी तकनीक विकसित करने का रास्ता चुना। Tata Trusts और बाद में Zoho से मिले समर्थन ने कंपनी को उस दिशा में आगे बढ़ने का अवसर दिया।
क्या यह MRI मशीन गांवों और छोटे शहरों तक पहुंच सकती है?
यही इस तकनीक का सबसे बड़ा संभावित सामाजिक लाभ है। पारंपरिक MRI मशीन का वजन, स्थापना की जरूरतें, बिजली की खपत और रखरखाव ऐसी बाधाएं हैं जो छोटे अस्पतालों के लिए चुनौती बन सकती हैं। Voxelgrids का हल्का और कॉम्पैक्ट डिजाइन इन समस्याओं को कम करने की कोशिश करता है।
Tata Trusts ने बताया है कि मशीन को वाहन पर लगाकर मोबाइल MRI यूनिट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। करीब 2.3 टन वजन वाली मशीन को मोबाइल प्लेटफॉर्म पर ले जाना पारंपरिक कई टन वजन वाली MRI मशीन की तुलना में अधिक व्यावहारिक हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी गांव में तुरंत MRI वैन पहुंच जाएगी।
मोबाइल MRI के लिए प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ, मरीजों की सुरक्षा, बिजली, मशीन का संचालन, छवि की गुणवत्ता और चिकित्सकीय रिपोर्टिंग जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी होंगी। लेकिन यदि ये व्यवस्थाएं तैयार की जाती हैं, तो एक ही मशीन को अलग-अलग क्षेत्रों में ले जाकर MRI जांच उपलब्ध कराने का मॉडल भारत जैसे बड़े देश में खासा उपयोगी साबित हो सकता है।
भारत MRI के मामले में कितना आत्मनिर्भर हुआ है?
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि भारत ने MRI तकनीक में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है, लेकिन पूरी तरह आत्मनिर्भर होने का सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। 2023 में भारत सरकार ने Voxelgrids की 1.5 टेस्ला स्वदेशी MRI मशीन के लॉन्च की पुष्टि की थी। उस समय सरकार ने बताया था कि मशीन के विकास पर करीब ₹17 करोड़ खर्च हुए, जिसमें ₹12 करोड़ Department of Biotechnology के BIRAC के माध्यम से दिए गए थे। सरकार ने यह भी कहा था कि बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर इससे आयात पर निर्भरता और विदेशी मुद्रा खर्च कम करने की संभावना है।
अब 2026 में सामने आई जानकारी इस तकनीक के आगे बढ़ने की तस्वीर दिखाती है। Voxelgrids की मशीन का पहला क्लिनिकल इंस्टॉलेशन नागपुर के पास Chandrapur Cancer Care Foundation में किया गया था और वहां इसका इस्तेमाल मरीजों की जांच के लिए किया जा रहा है। कंपनी ने MRI के व्यावसायिक उत्पादन और बिक्री के लिए जरूरी लाइसेंस भी हासिल किए हैं।
इसलिए इसे भारत की मेडिकल-टेक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि कहना उचित है, लेकिन यह कहना कि भारत को अब MRI के लिए विदेशी तकनीक की बिल्कुल जरूरत नहीं रही, अभी सही नहीं होगा। असली परीक्षा तब होगी जब ऐसी मशीनें बड़ी संख्या में बनेंगी, अलग-अलग अस्पतालों में लगेंगी और उनकी कम लागत का फायदा वास्तव में मरीजों तक पहुंचेगा।
इस स्वदेशी MRI की असली सफलता मशीन बनाने से आगे तय होगी
भारत में MRI मशीन विकसित हो जाना अपने आप में बड़ी तकनीकी उपलब्धि है, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर तभी दिखाई देगा जब यह तकनीक प्रयोगशाला और कुछ क्लिनिकल केंद्रों से निकलकर बड़े पैमाने पर मरीजों तक पहुंचे।
अगर हल्की मशीन को मोबाइल यूनिट के रूप में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सका, निर्माण लागत कम रही, मशीन की तस्वीरों की गुणवत्ता चिकित्सकीय जरूरतों को पूरा करती रही और देश में इसकी सेवा व रखरखाव की मजबूत व्यवस्था बन गई, तो MRI जैसी महंगी जांच को छोटे शहरों और कम सुविधाओं वाले क्षेत्रों तक पहुंचाने का रास्ता खुल सकता है।
और यही इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि भारत ने MRI मशीन बनाई है। असली सवाल यह है कि क्या भारत ऐसी MRI तकनीक बना सकता है जो कम खर्च में तैयार हो, कम जगह में लग सके, दूरदराज के अस्पताल तक पहुंच सके और अंततः उस मरीज के लिए MRI जांच सस्ती कर सके जिसके लिए आज यह सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं है।
यदि यह लक्ष्य बड़े पैमाने पर हासिल होता है, तो Voxelgrids की कहानी केवल एक भारतीय स्टार्टअप की सफलता नहीं रहेगी; यह भारत में उच्च-स्तरीय चिकित्सा उपकरणों के घरेलू विकास और सस्ती स्वास्थ्य सुविधाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।



