भारत में जब भी लोग कोई पैक्ड खाद्य पदार्थ खरीदते हैं, तो सबसे पहले उसकी पैकेजिंग पर बना FSSAI का लोगो और लाइसेंस नंबर देखते हैं। अधिकांश लोगों का मानना होता है कि अगर किसी प्रोडक्ट पर यह लोगो मौजूद है, तो वह पूरी तरह सुरक्षित, शुद्ध और अच्छी गुणवत्ता वाला होगा। यही वजह है कि सरकारी जागरूकता अभियानों और विज्ञापनों में भी लोगों को FSSAI लोगो देखकर ही खाद्य उत्पाद खरीदने की सलाह दी जाती है।

लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग है। FSSAI का लाइसेंस नंबर यह बताता है कि संबंधित कंपनी या फूड बिजनेस ऑपरेटर खाद्य नियमों के तहत पंजीकृत या लाइसेंस प्राप्त है। इसका मतलब यह नहीं होता कि बाजार में बिक रहे हर पैकेट या हर बैच की अलग-अलग जांच करके उसे सुरक्षित घोषित किया गया है। यानी FSSAI का लोगो किसी प्रोडक्ट की पहचान और रेगुलेटरी रजिस्ट्रेशन को दर्शाता है, न कि हर पैक पर व्यक्तिगत गुणवत्ता प्रमाणपत्र।

यही कारण है कि कई बार लाइसेंस प्राप्त कंपनियों के उत्पादों में भी गुणवत्ता संबंधी शिकायतें या मिलावट के मामले सामने आ जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल FSSAI का लोगो देखकर किसी भी खाद्य उत्पाद को 100% सुरक्षित मान लेना सही नहीं होगा। उपभोक्ताओं को उत्पाद की सामग्री (Ingredients), निर्माण तिथि, एक्सपायरी डेट और निर्माता की जानकारी भी ध्यान से पढ़नी चाहिए।

भारत में FSSAI की फूड टेस्टिंग कैसे होती है?

भारत में खाद्य पदार्थों की जांच के लिए एक तय प्रक्रिया अपनाई जाती है। यदि किसी उत्पाद की शिकायत मिलती है, किसी निरीक्षण के दौरान संदेह होता है या नियमित जांच की जाती है, तो Food Safety Officer (FSO) संबंधित दुकान, गोदाम या फैक्ट्री से सैंपल एकत्र करता है। इसके बाद इन सैंपलों को अधिकृत प्रयोगशालाओं (Food Testing Laboratories) में भेजा जाता है, जहां उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा की जांच की जाती है।

यदि लैब रिपोर्ट में मिलावट, खराब गुणवत्ता या निर्धारित मानकों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित कंपनी या विक्रेता के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। मामले की गंभीरता के अनुसार जुर्माना, सुधार नोटिस, लाइसेंस निलंबन या गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई तक संभव है। कानून में खाद्य सुरक्षा को लेकर कई सख्त प्रावधान मौजूद हैं।

हालांकि, व्यवहारिक स्तर पर कई विशेषज्ञों का कहना है कि निरीक्षण की संख्या, स्टाफ की उपलब्धता, लैब क्षमता और कानूनी प्रक्रिया जैसी चुनौतियों के कारण हर मामले में तेज़ कार्रवाई संभव नहीं हो पाती। यही वजह है कि कानून मजबूत होने के बावजूद समय-समय पर मिलावटी खाद्य पदार्थों के मामले सामने आते रहते हैं।

फिर भी बाजार में मिलावटी सामान क्यों बिक रहा है?

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यह सबसे बड़ा सवाल है कि यदि फूड टेस्टिंग की व्यवस्था मौजूद है, तो नकली पनीर, मिलावटी मसाले, फर्जी टमाटर सॉस और अन्य खाद्य पदार्थ बाजार तक पहुंच कैसे जाते हैं। इसका जवाब केवल एक कारण नहीं, बल्कि कई प्रशासनिक और व्यावहारिक चुनौतियों में छिपा हुआ है।

भारत जैसे विशाल देश में लाखों खाद्य कारोबार संचालित होते हैं, जबकि निरीक्षण करने वाले अधिकारियों और टेस्टिंग लैब्स की संख्या सीमित है। हर उत्पाद की नियमित जांच करना व्यवहारिक रूप से आसान नहीं है। कई मामलों में शिकायत मिलने के बाद ही कार्रवाई शुरू होती है। इसके अलावा लैब रिपोर्ट आने में समय लगना, कानूनी प्रक्रिया लंबी होना और अदालतों में मामलों का वर्षों तक चलना भी कार्रवाई की गति को प्रभावित करता है।

इसी कारण समय-समय पर विभिन्न राज्यों में नकली पनीर, मिलावटी मसाले, जिंजर-गार्लिक पेस्ट, टमाटर सॉस और अन्य खाद्य उत्पादों पर छापेमारी की खबरें सामने आती रहती हैं। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी व्यवस्था फेल है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि वर्तमान सिस्टम में सुधार और निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जाती है।

क्या FSSAI की फूड टेस्टिंग रियल है या फेक?

इस सवाल का सीधा जवाब “हाँ” या “नहीं” में देना सही नहीं होगा। FSSAI की फूड टेस्टिंग, नियम और कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह वास्तविक हैं। देशभर में अधिकृत लैब्स के माध्यम से खाद्य पदार्थों की जांच की जाती है और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई का भी प्रावधान है।

हालांकि, लोगों के मन में सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि कई बार बड़े पैमाने पर मिलावटी खाद्य पदार्थ पकड़े जाने के बावजूद ऐसे मामले लगातार सामने आते रहते हैं। इससे आम लोगों को लगता है कि व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी नहीं है। वास्तव में समस्या टेस्टिंग के अस्तित्व की नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन (Implementation), निगरानी और समय पर कार्रवाई की मानी जाती है।

इसलिए यह कहना कि “FSSAI की फूड टेस्टिंग पूरी तरह फेक है” तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। वहीं यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल FSSAI का लोगो किसी उत्पाद की पूरी सुरक्षा की गारंटी देता है। सही निष्कर्ष यही है कि व्यवस्था मौजूद है, लेकिन उसे और अधिक प्रभावी तथा पारदर्शी बनाने की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।

उपभोक्ताओं को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

जब तक फूड सेफ्टी सिस्टम और मजबूत नहीं हो जाता, तब तक उपभोक्ताओं की जागरूकता सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। किसी भी पैक्ड फूड को खरीदते समय केवल आकर्षक पैकेजिंग या बड़े-बड़े दावों पर भरोसा न करें। हमेशा एक्सपायरी डेट, निर्माण तिथि, Ingredients List और निर्माता की जानकारी जरूर पढ़ें।

यदि किसी खाद्य उत्पाद में रंग, गंध, स्वाद या गुणवत्ता को लेकर संदेह हो, तो उसका सेवन करने से बचें और संबंधित अधिकारियों को शिकायत करें। बहुत कम कीमत पर बिक रहे संदिग्ध उत्पादों से भी सावधानी बरतना जरूरी है। साथ ही, “100% Natural”, “Healthy” या “Sugar Free” जैसे दावों को बिना लेबल पढ़े सच मान लेना भी सही नहीं है।

एक जागरूक उपभोक्ता ही मिलावट के खिलाफ सबसे मजबूत रक्षा बन सकता है। इसलिए जानकारी के आधार पर खरीदारी करना और संदिग्ध मामलों की शिकायत करना हर नागरिक की जिम्मेदारी भी है।

आख़िरी बात

FSSAI भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए बनाई गई एक महत्वपूर्ण नियामक संस्था है और इसकी टेस्टिंग व्यवस्था वास्तविक है। लेकिन केवल FSSAI का लोगो देखकर किसी भी खाद्य उत्पाद को पूरी तरह सुरक्षित मान लेना उचित नहीं होगा। वर्तमान व्यवस्था में कानून मौजूद हैं, फिर भी निगरानी, निरीक्षण और प्रभावी कार्रवाई को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

ऐसे में सबसे बेहतर तरीका यही है कि उपभोक्ता जागरूक रहें, लेबल ध्यान से पढ़ें, विश्वसनीय उत्पाद चुनें और किसी भी संदिग्ध खाद्य पदार्थ की शिकायत संबंधित विभाग तक पहुंचाएं। सुरक्षित भोजन केवल सरकार की ही नहीं, बल्कि जागरूक उपभोक्ताओं की भी साझा जिम्मेदारी है।