मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा की अजनार नदी इन दिनों एक 20-21 साल के युवक की वजह से देशभर में चर्चा में है। सोशल मीडिया पर ‘बिट्टू तबाही’ नाम से पहचाने जाने वाले सुरेंद्र सिंह चौधरी ने महीनों तक नदी में उतरकर प्लास्टिक, बोतलें, खरपतवार और जमा हुआ कचरा अपने हाथों से हटाया। शुरुआत में यह काम किसी बड़े संगठन, अभियान या सरकारी मशीनरी के सहारे नहीं हुआ था। यही वजह है कि उनके सफाई अभियान की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गए।
लेकिन बिट्टू तबाही की कहानी को केवल एक युवक द्वारा नदी साफ करने की वायरल कहानी समझना अधूरा होगा। अजनार नदी की गंदगी कोई नई समस्या नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड में भी कई साल पहले नदी की सफाई, सौंदर्यीकरण और उसमें गिरने वाले गंदे नालों को रोकने का मुद्दा उठ चुका था। अब बिट्टू की मुहिम के बाद यह पुरानी समस्या फिर से सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गई है।
इसी बीच उद्योगपति आनंद महिंद्रा और पूर्व क्रिकेटर केविन पीटरसन ने उनके प्रयास की सराहना की, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी उनसे मुलाकात की और अब The Ocean Cleanup के संस्थापक बॉयन स्लैट की ओर से उन्हें काम के लिए आमंत्रित किए जाने की खबर सामने आई है। हालांकि इसे अभी पक्की नौकरी या विदेश में नियुक्ति कहना सही नहीं होगा; उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह काम करने का आमंत्रण है।
बिट्टू तबाही कौन हैं और उन्होंने अजनार नदी की सफाई क्यों शुरू की?
बिट्टू तबाही का असली नाम सुरेंद्र सिंह चौधरी है। वह मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा के रहने वाले बीएससी छात्र हैं। सोशल मीडिया पर ‘बिट्टू तबाही’ नाम से उनकी पहचान बनी, लेकिन जिस काम के कारण वह चर्चा में आए, वह उनके नाम के बिल्कुल उलट है—उन्होंने अपने आसपास फैली गंदगी को साफ करने का फैसला किया।
रिपोर्टों के मुताबिक, सुरेंद्र ने 26 जनवरी 2026, यानी गणतंत्र दिवस से अजनार नदी की सफाई शुरू की। शुरुआत में उनके साथ कुछ दोस्त भी जुड़े, लेकिन समय के साथ यह काम काफी हद तक उनका व्यक्तिगत अभियान बन गया। नदी में जमा प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथीन, खरपतवार और दूसरे ठोस कचरे को वह खुद निकालते रहे। उनके पास बड़ी सफाई मशीनें या पेशेवर सुरक्षा उपकरण नहीं थे, इसलिए कई बार उन्हें सीधे नदी के गंदे पानी में उतरकर काम करना पड़ा।
यहां इस कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सफाई का काम केवल कैमरे के सामने किया गया कोई एक-दो दिन का अभियान नहीं था। रिपोर्टों में उनके कई महीनों तक लगातार काम करने का उल्लेख है। इसी दौरान उनके हाथों में संक्रमण जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी हुईं। कुछ रिपोर्टों में उनके द्वारा सफाई और जरूरी सामान पर अपनी जेब से करीब 30 हजार रुपये खर्च करने की बात भी सामने आई है।
सोशल मीडिया पर उनकी पहले और बाद की तस्वीरें वायरल होने के बाद कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि क्या इतनी बड़ी सफाई एक व्यक्ति कर सकता है और क्या तस्वीरें वास्तविक हैं। इस दावे पर ब्यावरा नगरपालिका के अधिकारी ने बाद में कहा कि सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीरें वास्तविक हैं। नगरपालिका ने खुद भी सफाई अभियान में मशीनरी और स्थानीय लोगों की भागीदारी का उल्लेख किया।
अजनार नदी की समस्या आज की नहीं, विधानसभा में भी उठ चुका है मुद्दा
बिट्टू तबाही की मुहिम को समझने के लिए अजनार नदी का पुराना रिकॉर्ड देखना जरूरी है। मध्य प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में 21 मार्च 2022 को ब्यावरा के तत्कालीन विधायक रामचंद्र दांगी ने अजनार नदी के सौंदर्यीकरण और सफाई को लेकर सवाल पूछा था। सवाल में कहा गया था कि शहर के बीच से गुजरने वाली अजनार नदी में शहर के गंदे नाले मिलते हैं और नदी की गंदगी से बीमारी फैलने का खतरा बना रहता है।
उस सवाल का सरकारी जवाब भी इस मामले को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। सरकार ने बताया था कि अजनार नदी में मिलने वाले चार नालों के गंदे पानी को नदी में जाने से रोकने के लिए डीपीआर यानी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया चल रही थी। साथ ही यह भी कहा गया था कि उस समय इस कार्ययोजना को 2022-23 के बजट में शामिल करने की स्वीकृति नहीं दी गई थी और कार्य शुरू होने की समय-सीमा बताना संभव नहीं था।
इससे साफ होता है कि अजनार नदी की समस्या केवल अचानक पैदा हुई गंदगी नहीं है। इससे पहले भी नदी में गिरने वाले नालों और सफाई को लेकर सरकारी स्तर पर चर्चा हो चुकी थी। इससे भी पुराना रिकॉर्ड देखें तो 2021 में भी विधानसभा में अजनार नदी के सौंदर्यीकरण से जुड़ा सवाल दर्ज है। यानी नदी को साफ और बेहतर बनाने की जरूरत लंबे समय से स्थानीय मुद्दा रही है।
2022 की एक स्थानीय रिपोर्ट में भी नदी की खराब स्थिति और उसमें मिलने वाले चार नालों को बड़ी समस्या बताया गया था। उस रिपोर्ट में यह उल्लेख था कि केवल नदी की सफाई करने से समस्या हल नहीं हो सकती, क्योंकि शहर का गंदा पानी लगातार नदी में पहुंच रहा था।
सिर्फ कचरा निकाल देने से अजनार नदी साफ नहीं होगी, असली समस्या गंदे पानी की है
यही वह हिस्सा है जो बिट्टू तबाही की कहानी को केवल प्रेरणादायक घटना से आगे ले जाता है। नदी में दिखाई देने वाला प्लास्टिक, बोतलें और ठोस कचरा समस्या का केवल एक हिस्सा हैं। ब्यावरा नगरपालिका के सब-इंजीनियर रूपेश कुमार नेताम के अनुसार, पांच बड़े नालों से गंदा पानी अजनार नदी में पहुंचता है। इस वजह से अगर आज नदी से पुराना कचरा निकाल भी दिया जाए, तो गंदे पानी का प्रवाह जारी रहने पर प्रदूषण दोबारा लौट सकता है।
इसी समस्या को रोकने के लिए करीब 14.77 करोड़ रुपये की लागत से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य नदी में पहुंचने वाले गंदे पानी को सीधे नदी में जाने से रोकना और उसे उपचारित करना है। यानी नदी की स्थायी सफाई के लिए केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि उस जगह पर काम करना जरूरी है जहां से प्रदूषण नदी में पहुंच रहा है।
नगरपालिका ने बिट्टू के अभियान के बाद मशीनरी भी लगाई। अधिकारियों के अनुसार, नदी में लंबे समय से जमा पुराने कचरे और मलबे को हटाने के लिए पोकलेन मशीन का इस्तेमाल किया गया और स्थानीय नागरिकों ने भी सफाई में सहयोग किया। इसका मतलब यह है कि बिट्टू की व्यक्तिगत पहल अब प्रशासनिक कार्रवाई को भी प्रभावित करती दिखाई दे रही है।
लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा—नदी का एक हिस्सा साफ दिखाई देना और नदी का पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हो जाना दो अलग बातें हैं। ठोस कचरा हटाने से नदी का दृश्य बदल सकता है, लेकिन जब तक नालों से आने वाले गंदे पानी और दोबारा कचरा डालने की समस्या पर नियंत्रण नहीं होगा तब तक सफाई को स्थायी सफलता नहीं माना जा सकता।
बिट्टू तबाही का काम वायरल कैसे हुआ और आनंद महिंद्रा-केविन पीटरसन तक बात कैसे पहुंची?
सुरेंद्र की सफाई मुहिम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार साझा होने लगे। खास तौर पर नदी की हालत और सफाई के बाद के दृश्य में दिखाई देने वाला अंतर लोगों का ध्यान खींचने लगा। इसी वजह से उनका स्थानीय स्तर का अभियान धीरे-धीरे राष्ट्रीय चर्चा में आ गया।
उनके काम की सराहना करने वालों में उद्योगपति आनंद महिंद्रा भी शामिल रहे। इसके बाद पूर्व इंग्लैंड क्रिकेटर केविन पीटरसन ने भी उनकी मुहिम की प्रशंसा की। पीटरसन की पोस्ट में सुरेंद्र के नदी में उतरकर कचरा निकालने, दोस्तों के साथ मिलकर सफाई के लिए संसाधन जुटाने और अपनी तरफ से पैसे खर्च करने जैसे पहलुओं का उल्लेख किया गया।
यहां सोशल मीडिया की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। किसी छोटे शहर में किया गया स्थानीय काम सामान्य परिस्थितियों में शायद उसी इलाके तक सीमित रह जाता। लेकिन लगातार साझा किए गए वीडियो और पहले-बाद की तस्वीरों ने इस मुहिम को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचा दिया। इसके बाद कहानी सिर्फ एक युवक नदी साफ कर रहा है तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल भी उठने लगा कि आखिर एक स्थानीय नदी की हालत इतनी खराब कैसे हुई और उसे साफ रखने की जिम्मेदारी किसकी है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात के बाद प्रशासन की भूमिका भी बदली
बिट्टू तबाही की मुहिम जब व्यापक चर्चा में आई तो मामला मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक भी पहुंचा। रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री ने सुरेंद्र से मुलाकात कर उनके प्रयास की सराहना की। इसके बाद अजनार नदी की सफाई को लेकर स्थानीय प्रशासन की गतिविधियां भी चर्चा में आईं।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि सुरेंद्र ने जिस काम की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर की थी, उसमें अब नगरपालिका की मशीनरी और स्थानीय नागरिक भी शामिल हो रहे हैं। नगरपालिका के अधिकारियों ने बताया कि पुराने मलबे को हटाने के लिए मशीन लगाई गई और नदी की सफाई में स्थानीय स्तर पर सहयोग भी किया गया।
फिर भी इसे यह मान लेना सही नहीं होगा कि प्रशासन ने अब अजनार नदी की समस्या पूरी तरह हल कर दी है। ₹14.77 करोड़ के STP का प्रस्ताव बताता है कि नदी में गंदे पानी के प्रवेश की मूल समस्या अभी भी एक बड़ी चुनौती है। प्रस्ताव बनना और उसका वास्तविक निर्माण व संचालन शुरू होना अलग-अलग चरण हैं। इसलिए आने वाले समय में इस परियोजना की प्रगति ही यह तय करेगी कि सफाई अभियान स्थायी परिणाम में कितना बदल पाता है।
अब बिट्टू तबाही को विदेश से मिला काम का ऑफर, क्या है पूरी कहानी?

अजनार नदी की सफाई का मामला भारत से बाहर भी पहुंचा। The Ocean Cleanup के संस्थापक और सीईओ बॉयन स्लैट की नजर सुरेंद्र के काम पर पड़ी। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर सुरेंद्र को अपने संगठन के साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया। कई रिपोर्टों में इसे “Come work for us” वाले प्रस्ताव के रूप में बताया गया है।
The Ocean Cleanup प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए काम करने वाली नीदरलैंड स्थित पर्यावरण संस्था है। ऐसे संगठन के प्रमुख का किसी स्थानीय स्तर पर नदी की सफाई करने वाले युवक के काम को देखकर सीधे संपर्क करना सुरेंद्र के अभियान की अंतरराष्ट्रीय पहुंच को दिखाता है।
हालांकि यहां एक बात साफ रखना जरूरी है। बॉयन स्लैट का आमंत्रण मिलना और सुरेंद्र का आधिकारिक तौर पर The Ocean Cleanup में नौकरी शुरू कर देना एक ही बात नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों में उन्हें काम के लिए बुलाए जाने की जानकारी है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि उनकी नियुक्ति, पद, वेतन या विदेश जाकर काम करने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
क्या अजनार नदी पूरी तरह साफ हो गई है? तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल है
सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में अजनार नदी के कुछ हिस्सों में सफाई के बाद बड़ा बदलाव दिखाई देता है। लेकिन इसे पूरी नदी के पूरी तरह साफ हो जाने का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। खुद स्थानीय प्रशासन की जानकारी बताती है कि नदी में गंदा पानी पहुंचने की समस्या अभी मौजूद है और इसी कारण STP का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
इसके अलावा सफाई के बाद भी लोगों द्वारा दोबारा नदी में कचरा डालने की समस्या सामने आई है। यानी नदी को साफ करने की चुनौती दो स्तरों पर है—पहला, वर्षों से जमा कचरे और गंदे पानी को हटाना; दूसरा, भविष्य में उसी नदी को दोबारा कूड़ेदान बनने से रोकना।
यही वजह है कि बिट्टू तबाही की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल यह नहीं है कि उन्होंने कितनी बोतलें या कितना कचरा निकाला। बड़ी बात यह है कि उनके अभियान ने अजनार नदी की पुरानी समस्या को फिर से लोगों और प्रशासन के सामने ला दिया है।
अजनार नदी के लिए अब असली चुनौती क्या है?
अगर अजनार नदी को लंबे समय तक साफ रखना है तो केवल एक सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले नदी में जाने वाले गंदे पानी के स्रोतों पर नियंत्रण करना होगा। इसके लिए प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट जैसी व्यवस्था को जमीन पर उतारना, नालों के प्रवाह को नियंत्रित करना और उपचारित पानी के बाद ही उसे नदी तंत्र में छोड़ना जरूरी होगा।
इसके साथ नदी किनारे कचरा फेंकने पर रोक, पर्याप्त कूड़ेदान, नियमित निगरानी और स्थानीय लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। वरना आज हटाया गया प्लास्टिक कुछ समय बाद फिर उसी जगह दिखाई दे सकता है।
बिट्टू तबाही ने जिस बात को अपने तरीके से साबित किया है, वह यह है कि किसी समस्या को बदलने के लिए पहला कदम कोई एक व्यक्ति भी उठा सकता है। लेकिन अजनार नदी को वास्तव में बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ सुरेंद्र सिंह चौधरी की नहीं हो सकती। एक युवक की मेहनत किसी समस्या को सामने ला सकती है, लोगों को जोड़ सकती है और प्रशासन को सक्रिय कर सकती है; लेकिन नदी को वर्षों तक साफ रखने के लिए नागरिकों, नगरपालिका और सरकारी व्यवस्था—तीनों को लगातार काम करना होगा।
अजनार नदी की कहानी इसलिए सिर्फ ‘बिट्टू तबाही’ की वायरल कहानी नहीं है। यह उस अंतर की कहानी भी है जो किसी नदी की सफाई की तस्वीर और नदी को प्रदूषित होने से रोकने वाली स्थायी व्यवस्था के बीच होता है। सुरेंद्र ने पहला काम अपने हाथों से शुरू कर दिया है; अब असली परीक्षा यह है कि अजनार नदी को दोबारा उसी हालत में लौटने से कौन रोकता है।



