पिछले कुछ दिनों से अगर आपने Instagram Reels या Facebook Reels स्क्रॉल किए हैं तो शायद एक चीज़ बार-बार आपकी नज़र में आई होगी—गंदे सरकारी स्कूलों के टॉयलेट, दूषित पीने का पानी, जर्जर स्कूल भवन, सोते हुए शिक्षक, 11 का पहाड़ा न बता पाने वाले शिक्षक, स्कूल परिसर में शराब पीने के आरोप, कैमरा बंद करवाते प्रधानाध्यापक और कुछ मामलों में FIR तक की खबरें।
पहली नज़र में ये अलग-अलग वायरल वीडियो लगते हैं, मगर असल में इनके पीछे एक साझा अभियान काम कर रहा है—Cockroach Janta Party (CJP) का “स्कूल ठीक करो अभियान”।
CJP सोशल मीडिया पर चल रहा एक creator-led सामाजिक ऑडिट अभियान है, जिसके तहत अलग-अलग राज्यों के content creators और आम नागरिक अपने नज़दीकी सरकारी स्कूलों का दौरा कर वहाँ की वास्तविक स्थिति को वीडियो के माध्यम से दस्तावेज़ करते हैं। इस पहल का उद्देश्य किसी एक शिक्षक या स्कूल को बदनाम करना नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं, जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े उन मुद्दों को सामने लाना है, जिनका असर सीधे लाखों बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है।
15 अगस्त 2026 को शुरू हुआ यह अभियान कुछ ही दिनों में देशभर में फैल गया। महाराष्ट्र से शुरू हुई यह पहल बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कई अन्य राज्यों तक पहुँच गई, जहाँ creators ने अपने मोबाइल कैमरे के ज़रिए स्कूलों की ज़मीनी तस्वीर रिकॉर्ड करनी शुरू कर दी। कहीं बच्चे गंदा पानी पीते दिखाई दिए, कहीं टॉयलेट महीनों से साफ़ नहीं थे, कहीं क्लासरूम की जगह झोपड़ी में पढ़ाई हो रही थी, तो कहीं शिक्षकों और creators के बीच तीखी बहस कैमरे में कैद हुई।
यही वजह है कि आज CJP का स्कूल ठीक करो अभियान केवल सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर चल रही सबसे बड़ी जन-बहसों में से एक बन चुका है।
स्कूल ठीक करो अभियान की शुरुआत कैसे हुई और इसका मकसद क्या है?

स्कूल ठीक करो, CJP का दूसरा बड़ा जन अभियान माना जा रहा है। इससे पहले संगठन शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर एंटी-NEET आंदोलन के कारण चर्चा में रहा था। इस बार उसका पूरा फोकस सरकारी स्कूलों की जमीनी वास्तविकता पर रखा गया।
15 अगस्त 2026 की सुबह महाराष्ट्र के हिंगोली ज़िले के संतुक पिंपरी गाँव से CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इस अभियान की शुरुआत की। उनके साथ सह-संयोजक सौरव दास ने इसे नागरिकों द्वारा चलाया जाने वाला सामाजिक ऑडिट बताया।
अभियान के लिए एक सार्वजनिक चेकलिस्ट जारी की गई, जिसके आधार पर कोई भी नागरिक अपने क्षेत्र के सरकारी स्कूल में जाकर यह देख सकता है कि वहाँ शौचालय चालू हैं या नहीं, बच्चों को साफ़ पीने का पानी मिल रहा है या नहीं, बिजली और पंखे काम कर रहे हैं या नहीं, शिक्षक नियमित मौजूद हैं या नहीं, मिड-डे मील की व्यवस्था कैसी है और स्कूल भवन बच्चों के लिए सुरक्षित है या नहीं।
यानी यह आंदोलन लोगों से धरना देने की अपील नहीं करता, बल्कि कहता है—अपने गाँव के सरकारी स्कूल की सच्चाई रिकॉर्ड कीजिए और उसे सार्वजनिक कीजिए। इसी सोच के साथ “सरपंच चैलेंज” जैसी पहल भी शुरू की गई, ताकि स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय हो सके।
महाराष्ट्र के लातूर में अभिजीत दिपके ने कथित “सजावटी स्कूल” का कैसे किया पर्दाफाश?

स्कूल ठीक करो अभियान के दौरान महाराष्ट्र के लातूर ज़िले से सामने आया एक वीडियो पूरे अभियान के सबसे चर्चित खुलासों में शामिल हो गया। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके जब एक सरकारी स्कूल के निरीक्षण के लिए पहुँचे, तो उन्हें स्कूल में कई ऐसी चीज़ें दिखाई दीं जिन पर उन्होंने मौके पर ही सवाल उठा दिए।
वायरल वीडियो के अनुसार, दिपके ने सबसे पहले नई स्टील की प्लेटों, हाल ही में लाई गई लाइब्रेरी सामग्री और स्कूल परिसर में एक दिन पहले पहुँची JCB मशीन का ज़िक्र किया। उनका दावा था कि स्कूल प्रशासन को पहले से दौरे की जानकारी थी, इसलिए निरीक्षण से ठीक पहले स्कूल को अस्थायी रूप से व्यवस्थित और आकर्षक दिखाने की कोशिश की गई।
लेकिन सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब उन्होंने वहाँ बैठे बच्चों से बातचीत शुरू की। दिपके ने बच्चों से पूछा कि वे किस स्कूल के छात्र हैं। वीडियो में कुछ बच्चों के जवाब के आधार पर उन्होंने आरोप लगाया कि मीडिया के सामने भोजन करते दिखाए जा रहे कई बच्चे उस सरकारी स्कूल के नहीं थे, बल्कि उन्हें दूसरे स्कूल से लाकर वहाँ बैठाया गया था ताकि निरीक्षण के दौरान स्कूल की स्थिति बेहतर दिखाई जा सके।
अभिजीत दिपके ने कैमरे पर इसे धोखाधड़ी बताते हुए कहा कि यदि किसी स्कूल की वास्तविक समस्याएँ दूर करने के बजाय केवल निरीक्षण के दिन नई प्लेटें, नया सामान और दूसरे स्कूल के बच्चों के सहारे अच्छी तस्वीर पेश की जाती है, तो इससे सबसे अधिक नुकसान उन बच्चों का होता है जो रोज़ उसी सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। यही वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुआ और CJP स्कूल ठीक करो अभियान के सबसे चर्चित मामलों में गिना जाने लगा।
महत्वपूर्ण: यह घटनाक्रम CJP द्वारा जारी वायरल वीडियो और अभिजीत दिपके के सार्वजनिक बयान पर आधारित है। इस मामले में संबंधित स्कूल प्रशासन का आधिकारिक पक्ष या स्वतंत्र जांच रिपोर्ट इस समय सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
सरकारी स्कूलों के अंदर कैमरे में क्या-क्या सामने आया?
अभियान के दौरान सामने आए दर्जनों वायरल वीडियो देखने पर एक समान पैटर्न दिखाई देता है। समस्याएँ अलग-अलग राज्यों की हैं, लेकिन उनकी प्रकृति लगभग एक जैसी है। सबसे अधिक जिन मुद्दों ने लोगों का ध्यान खींचा, उनमें गंदे टॉयलेट, दूषित पानी, जर्जर भवन, मिड-डे मील की स्थिति, शिक्षकों की कार्यशैली और प्रशासनिक जवाबदेही शामिल हैं।
कई स्कूलों में टूटे हुए शौचालय, बदबूदार परिसर और महीनों से साफ़ न किए गए टॉयलेट दिखाई दिए। कुछ वीडियो में लड़कियों के लिए बने शौचालय इस्तेमाल करने लायक नहीं थे। इससे यह सवाल उठने लगा कि स्वच्छ विद्यालय अभियान के दावे ज़मीनी स्तर पर कितने प्रभावी हैं।
राजस्थान का एक वीडियो पूरे अभियान का सबसे चर्चित दृश्य बन गया, जिसमें बच्चे स्टील की बाल्टी से हल्के भूरे रंग का पानी गिलास में भरकर पीते दिखाई देते हैं। वीडियो में कोई भाषण नहीं है, लेकिन सिर्फ़ यह दृश्य लाखों लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या सरकारी स्कूलों में बच्चों को वास्तव में सुरक्षित पीने का पानी उपलब्ध है।
कई अन्य वीडियो में खराब हैंडपंप, खाली पानी की टंकियाँ, टूटे हुए पंखे, जर्जर बेंच और बिजली की अनुपलब्धता भी दिखाई गई। यानी मुद्दा केवल एक टॉयलेट या एक स्कूल का नहीं, बल्कि उन बुनियादी सुविधाओं का है जो हर बच्चे का अधिकार मानी जाती हैं।
इसी दौरान कई ऐसे वीडियो भी सामने आए जिनमें सरकारी स्कूलों की इमारतें बेहद खराब हालत में दिखाई देती हैं। कहीं छत गिरने की स्थिति में थी, कहीं दीवारों में बड़ी दरारें थीं, तो कहीं बच्चे बांस और फूस से बनी अस्थायी झोपड़ी में बैठकर पढ़ाई करते दिखाई दिए। एक वायरल क्लिप में ब्लैकबोर्ड भी बांस की दीवार से टिकाकर लगाया गया था, जिसने ग्रामीण शिक्षा की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
Creators ने केवल इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि मिड-डे मील की रसोई, भोजन की गुणवत्ता और स्कूल परिसर की साफ़-सफ़ाई को भी रिकॉर्ड किया। कई जगह भोजन वितरण और रसोई व्यवस्था पर भी लोगों ने सवाल उठाए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि अभियान का उद्देश्य केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि बच्चों के पूरे विद्यालयी वातावरण का सामाजिक ऑडिट करना है।
शिक्षकों से जुड़े वायरल वीडियो ने सबसे बड़ी बहस क्यों छेड़ दी?
स्कूल ठीक करो अभियान का सबसे चर्चित और विवादित हिस्सा शिक्षकों से जुड़े वीडियो रहे। कई वीडियो में creators सीधे शिक्षकों से सवाल पूछते दिखाई देते हैं और यहीं से सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा बहस शुरू होती है।
एक वायरल वीडियो में creator कैमरे के सामने एक शिक्षक से 11 का पहाड़ा लिखने के लिए कहता है। वीडियो में शिक्षक सही उत्तर देने में असहज दिखाई देते हैं और यह क्लिप देखते ही देखते लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। लोगों ने इसे सरकारी शिक्षकों की गुणवत्ता से जोड़कर देखा, जबकि दूसरी तरफ़ कई लोगों ने कहा कि कुछ सेकंड का वीडियो पूरी घटना का संदर्भ नहीं बता सकता।
बिहार का एक और वीडियो सबसे अधिक शेयर किया गया, जिसमें बच्चों के बीच एक शिक्षिका कुर्सी लगाकर आराम करती दिखाई देती हैं। छात्र क्लास में मौजूद हैं, लेकिन पढ़ाई नहीं हो रही। इस वीडियो ने लोगों के बीच यह सवाल खड़ा किया कि क्या स्कूलों में केवल उपस्थिति दर्ज होना ही पर्याप्त है, या वास्तविक शिक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसी अभियान के दौरान एक अन्य वीडियो में creator स्कूल परिसर के भीतर एक शिक्षक पर शराब पीने का आरोप लगाता दिखाई देता है। यह वीडियो भी तेज़ी से वायरल हुआ और लोगों ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। हालाँकि ऐसे मामलों में यह समझना ज़रूरी है कि वायरल वीडियो अपने आप किसी व्यक्ति के खिलाफ अंतिम प्रमाण नहीं होते। किसी भी आरोप की पुष्टि संबंधित प्रशासनिक या कानूनी प्रक्रिया से ही मानी जानी चाहिए।
कई वीडियो में creators स्कूल की उपस्थिति रजिस्टर, बच्चों की पढ़ाई, मिड-डे मील और सरकारी सुविधाओं को लेकर सीधे सवाल पूछते दिखाई देते हैं। कुछ मामलों में शिक्षक जवाब देने से बचते हैं, तो कुछ वीडियो में कैमरा बंद करवाने की कोशिश करते नज़र आते हैं। यही वजह है कि इस अभियान ने “सरकारी जवाबदेही” को सबसे ज़्यादा चर्चा में ला दिया।
रिकॉर्डिंग के दौरान विवाद, धमकियाँ और FIR तक कैसे पहुँची बात?
जितनी चर्चा स्कूलों की बदहाल व्यवस्था की हुई, उतनी ही चर्चा रिकॉर्डिंग को लेकर हुए विवादों की भी हुई। बिहार के बक्सर सहित कई स्थानों से ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें creators का दावा है कि उन्हें सरकारी स्कूलों के अंदर वीडियो बनाने से रोका गया। कहीं प्रधानाध्यापक ने वीडियो हटाने की चेतावनी दी, कहीं शिक्षकों ने कैमरा बंद करवाने की कोशिश की और कुछ मामलों में धक्का-मुक्की तथा बदसलूकी तक के आरोप लगे।
सबसे चर्चित घटनाक्रम बिहार के पूर्वी चंपारण ज़िले के हरसिद्धि थाना क्षेत्र से जुड़ा माना जा रहा है। वायरल वीडियो की श्रृंखला के अनुसार एक creator ने स्थानीय सरकारी स्कूल की स्थिति रिकॉर्ड की, जिसके बाद उसने धमकियाँ मिलने का दावा किया। अगले वीडियो में वह हरसिद्धि थाने पहुँचकर शिकायत दर्ज कराने की बात करता है, जबकि बाद के वीडियो में FIR और कथित गिरफ्तारी का उल्लेख किया जाता है।
यह घटनाक्रम सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया गया, लेकिन FIR की पूरी कानूनी प्रक्रिया, धाराएँ या सभी तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि केवल वायरल वीडियो के आधार पर नहीं की जा सकती। इसलिए इसे वायरल वीडियो में दर्ज घटनाक्रम के रूप में देखना अधिक उचित है, न कि अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में।
दूसरी ओर, कई शिक्षकों का तर्क भी सामने आया कि बिना अनुमति रिकॉर्डिंग और अधूरी क्लिप वायरल होने से उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। यही वजह है कि यह बहस केवल कैमरे की नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही और व्यक्तिगत गरिमा के बीच संतुलन की भी बन गई है।
स्कूल ठीक करो अभियान ने शिक्षा व्यवस्था पर कैसी बहस छेड़ दी?
इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि सरकारी स्कूलों की रोज़मर्रा की समस्याएँ राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गईं, जिन मुद्दों पर पहले स्थानीय स्तर पर ही बात होती थी, वे अब देशभर के लोगों तक पहुँच रहे हैं।
एक तरफ़ creators का कहना है कि सार्वजनिक संस्थानों में सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है और यदि सरकारी स्कूलों में बच्चों को बुनियादी सुविधाएँ नहीं मिल रही हैं, तो उसे कैमरे पर दिखाना गलत नहीं है। दूसरी तरफ़ कई शिक्षक यह तर्क देते हैं कि कुछ सेकंड के वीडियो पूरे स्कूल की वास्तविकता नहीं दिखाते और ग्रामीण स्कूलों में स्टाफ़ की कमी, गैर-शैक्षणिक सरकारी ड्यूटी और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ भी वास्तविक हैं।
यही कारण है कि CJP का स्कूल ठीक करो अभियान केवल “Expose” करने का अभियान नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की माँग करने वाला नागरिक आंदोलन बन गया है। इसकी असली सफलता views या followers से नहीं, बल्कि उस दिन से मापी जाएगी जब किसी सरकारी स्कूल के बच्चे को गंदा पानी पीने, टूटे हुए टॉयलेट का इस्तेमाल करने या जर्जर छत के नीचे पढ़ाई करने के लिए मजबूर न होना पड़े।
अंतिम बात
CJP का स्कूल ठीक करो अभियान यह याद दिलाता है कि शिक्षा केवल किताबों और पाठ्यक्रम का विषय नहीं है। एक साफ़ टॉयलेट, सुरक्षित क्लासरूम, स्वच्छ पानी, नियमित शिक्षक और सम्मानजनक विद्यालयी वातावरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
गंदे शौचालय, दूषित पानी, झोपड़ी में चलती कक्षाएँ, 11 का पहाड़ा न बता पाने वाले शिक्षक, क्लासरूम में सोती शिक्षिका, शराब पीने के आरोप, रिकॉर्डिंग रोकने की कोशिशें और हरसिद्धि जैसे FIR विवाद—इन सभी वायरल वीडियो ने एक बात साफ़ कर दी है कि भारत के सरकारी स्कूलों की ज़मीनी हकीकत पर अब देश खुलकर बात कर रहा है।
आख़िरकार सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या हर सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा वह बुनियादी सम्मान और सुविधाएँ पा रहा है, जिसका उसे संवैधानिक अधिकार है?



